
بقلم الكاتب /عثمان أحمد مروعي
من أجّلِ..فَاتِنْتّي
رَسّمْتُ..الهَوى
وبَدأتُ..ثَورَاتِي
معَ .. الهَذّيَانِ
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أعّدتُ.. تَرّتِيبَ
الدَفاتِرِ..والدُمى
وأعَدتُ..مَقّعَدها
على..شّريِانِي
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عَادْت..كما كانت
أمِيرةُ..مَبْسّمٍ
تُشّدي..الوجود
بمَنّظَرٍ..فَتّانِ
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حُوريةٌ..والشّعُرُ
ألفُ..حكايةٍ
مَعزّوفةٌ..عُزفَت
بعّزّفِ..كمانِ
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عَادتْ..بأنّفَاسِ
الحَياةِ..وعِطرها
مَا رِيحَةِ ..
الأزّهارِ..والريحانَ
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حسّنَاءُ..كالبدر
التمامِ..ورمْشّها
طِبْ..الفؤادِ
نهايةَ..الأحزانِ
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فمياهُ..عينيها
جداولُ..واحةٍ
تُسّقي..صحاري
العِشّقِ والحّرمَانِ..
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أدمنتُها..عِشّقَاً
فكّانت..خّمرتِي
فمَزّجّتُ..فيها
العِشّق..بالإدّمَانِ
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ويّلاهُ..كم يخشى
الفُؤادُ ..فراقها
ويّلاهُ..من يقوى
على..حرماني
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ضّاقت..عُيوني
بِالمَهالكِ..والردى
تَاهت ..
حروفُ الشوق
خلفَ..لِساني
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ويلاهُ..كم يخشى
الفؤادُ..فراقها
فيطيبُ..مسكنها
على..أكفاني
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